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दिसंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
जिंदगी की किताब से तुम्हारा वाला पन्ना________ फाड़ दिया है मैने अब वो जगह हमेशा रिक्त_________ ही तो रहेगा  और किताब को भी उस पन्ने की कमी___________ महसूस होती रहेगी उम्र भर..................
तुम तक पहुँचने के लिए मेरा तुमसे और तुम्हारा मुझसे बिछड़ना जरूरी था... हमारा मिलना तो तय ही  है... इस जहाँ में न मिले पाए तो गम क्यूँ करते हो. .. और भी कायनात हैं... हम मिलेगें वहाँ... जरूर मिलेंगे हम.! 🍁
मुझे दुनिया की जरूरत नहीं महीनों खुद से बात कर सकता हूं. ..
बड़ी तब्दीलियां आईं हैं.. अपने आप में लेकिन.. तुझे याद करने की.. वो आदत .. नहीं गई..
तेरे साथ जुड़कर भी तेरी कमी थी ,,,इतना अकेला तो मैं अकेले भी नही था. ....
आसान नहीं होता कुछ भी ... भीतर ही भीतर बहुत कुछ मरता है हर बार - जितनी बार तुम्हारा दिल दुखाता हूँ
अक्सर अपने आप से लड़ना होता है। कई बार दिन में कई बार! ख़ुद को ही जज करना होता है! ख़ुद से ही अजनबी होना पड़ता है! ख़ुद को बताना होता है कि ख़ुद तुम ग़लत हो या सही! और उस दौरान तुम कभी ग़लत हो ही नहीं सकते। समय गुज़रने के बाद पता चलता है तुम्हारा निकाला गया निष्कर्ष मात्र एक मिथक था। सब झूठ था! अब तो कहीं भागने का मन भी नही होता है! कहीं जाने का भी नहीं! किए हुए पे पछताने का भी नहीं। कोई हादसा हो तो धड़कने तो बढ़ती हैं पर माथे पे शिकन के साथ बैलेंस हो जाती हैं। कोई नया बवाल आए तो उसको ठीक से समझने से पहले ही पुराने ज़ख़्म के दर्द उभर के आने लगते हैं। दर्द लिख देने भर से नही आता। सुकून लिखने भर से नही आता। रोज़ कुछ न कुछ खोना होता है इस ज़िंदगी से। रोज़। हर रोज़! इस रोज़ रोज़ कुछ न कुछ खोने की फ़ितरत में कब ख़ुद की ज़िंदगी खो दी पता ही नही चला! कब वो मुस्कान आँखो के काले धब्बे में बदल गयी पता ही नहीं चला। लड़ाइयाँ सिर्फ़ जीतने या हारने के लिए नहीं होती है! लड़ाइयाँ संघर्ष के लिए होती हैं। लड़ने के लिए। अपना सब कुछ झोंक देने के लिए। परिणाम कुछ भी हो पर अंत में ये सुनने से बेहतर कु...
मुक़दमा चलता है ख़ुद का ख़ुद पर और दोषी भी ख़ुद ही होता है । इंसान और जब सज़ा भी ख़ुद को ही देनी हो तो ताउम्र घुटना ही होता है! ताउम्र! कभी कभी जी चाहता है चीख़ूँ चिल्लाऊँ ज़ोर ज़ोर से और एकांत में किसी पेड़ के नीचे बैठ के घुटनों पे सर रख कर  आँसू बहाऊँ
मैं परेशान हूँ कहीं कोई शख्स मुझे भी न पढ़ रहा हो ऐसे ही लम्हा लम्हा…अक्षर अक्षर मुझे मेरी किताब का आख़री अध्याय लिखना है लिखना है एक पल… सिर्फ़ एक पल जिसे मेरे सिवा न कोई पढ़ पाए न कोई समझ पाए
एक धुँधली सी याद बन के रहूँगा लेकिन रहूँगा ज़रूर तुम्हारे दिल में, जब भी याद आऊँगा तो हँसी से ज़्यादा दर्द दे जाऊँगा तुम्हें