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अक्सर अपने आप से लड़ना होता है। कई बार दिन में कई बार! ख़ुद को ही जज करना होता है! ख़ुद से ही अजनबी होना पड़ता है! ख़ुद को बताना होता है कि ख़ुद तुम ग़लत हो या सही! और उस दौरान तुम कभी ग़लत हो ही नहीं सकते। समय गुज़रने के बाद पता चलता है तुम्हारा निकाला गया
निष्कर्ष मात्र एक मिथक था। सब झूठ था!

अब तो कहीं भागने का मन भी नही होता है! कहीं जाने का भी नहीं! किए हुए पे पछताने का भी नहीं। कोई हादसा हो तो धड़कने तो बढ़ती हैं पर माथे पे शिकन के साथ बैलेंस हो जाती हैं। कोई नया बवाल आए तो उसको ठीक से समझने से पहले ही पुराने ज़ख़्म के दर्द उभर के आने लगते हैं। दर्द लिख देने भर से नही आता। सुकून लिखने भर से नही आता। रोज़ कुछ न कुछ खोना होता है इस ज़िंदगी से। रोज़। हर रोज़! इस रोज़ रोज़ कुछ न कुछ खोने की फ़ितरत में कब ख़ुद की ज़िंदगी खो दी पता ही नही चला! कब वो मुस्कान आँखो के काले धब्बे में बदल गयी पता ही नहीं चला।

लड़ाइयाँ सिर्फ़ जीतने या हारने के लिए नहीं होती है! लड़ाइयाँ संघर्ष के लिए होती हैं। लड़ने के लिए। अपना सब कुछ झोंक देने के लिए।
परिणाम कुछ भी हो पर अंत में ये सुनने से बेहतर कुछ नहीं “तुम लिखते अच्छा हो पर आदमी अच्छे नहीं हो” जिसमें अच्छा लिखने वाली बात झूठी है!

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