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मुक़दमा चलता है ख़ुद का ख़ुद पर और दोषी भी ख़ुद ही होता है । इंसान और जब सज़ा भी ख़ुद को ही देनी हो तो ताउम्र घुटना ही होता है! ताउम्र! कभी कभी जी चाहता है चीख़ूँ चिल्लाऊँ ज़ोर ज़ोर से और एकांत में किसी पेड़ के नीचे बैठ के घुटनों पे सर रख कर आँसू बहाऊँ


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